अभिमन्‍यु भारद्वाज 2:13:00 PM A+ A- Print Email
भारत में रेयरेस्‍ट ऑफ द रेयर यानि सबसे संगीन और धिनौने अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है ये फैसला भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में लिया था तब से लेकर आज तक कई संगीन अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई जा चकी है तो आइये जानें क्‍या होती है भारत में फांसी की पूरी प्रकिया - Know what is the whole process of hanging in India

जानें क्‍या होती है भारत में फांसी की पूरी प्रकिया - Know what is the whole process of hanging in India

अगर भारत में निचली अदालतों में फांसी की सजा मिलने के बाद सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है सुप्रीम कोर्ट भी अगर फांसी की सजा पर मुहर लगा दे तो फिर राष्ट्रपति से दया की अपील की जा सकती है अगर राष्ट्रपति भी इस अपील को खारिज कर दे तो फांसी दे दी जाती है फांसी की सजा निर्धारित होने के बाद डेथ वॉरंट जारी किया जाता है यह वारंट दया याचिका खारिज होने के बाद कभी भी आ सकता है मृत्‍युदंड वाले कैदी के साथ आगे की कार्यवाही जेल के मैनुआल के अनुसार होती है

क्यों हमेशा सुबह ही दी जाती है फांसी - Why are you always hanged in the morning

अंग्रेजों के जमाने से फांसी की सजा जेल में सुबह सूरज की पहली किरण से पहले ही दी जाती है केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जहां भी फांसी की सजा देने का प्रावधान है वहां फांसी भोर में ही दी जाती है हालांकि भारत के जेल मैन्यूल में फांसी के समय के बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश हैं जेल मैन्युअल के आनुसार फांसी सुबह तड़के ही दी जानी चाहिए यानि फांसी की पूरी प्रकिया सूरज की पहली किरण से पहले संपन्न हो जाए हालांकि हर मौसम के हिसाब से फांसी का समय सुबह बदल जाता है लेकिन ये समय भी तय करने का काम केंद्र और राज्य सरकारें ही करती हैं फांसी के सुबह के वक्‍त देने का कारण यह है कि अगर ये दिन के दौरान होंगी तो जेल का सारा फोकस इसी पर टिक जाएगा इससे बचने की कोशिश की जाती है ताकि जेल की दिनभर की अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़े सारी गतिविधियां सुचारू तौर पर काम करती रहें फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण होता है और उसके बाद कई तरह की कागजी कार्यवाहियां इन सबमें भी समय लगता है साथ ही ऐसा मानना है जिसे फांसी दी जा रही है उसका मन सुबह भोर के समय में ज्यादा शांत रहता है और सुबह जागने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव और दबाव का शिकार नहीं होता है

कहॉ बनाता है फांसी का फंदा

पूरे देश में फांसी देने के लिए रस्सी केवल बिहार के बक्सर सेंट्रल जेल में ही तैयार की जाती है बक्सर के सेंट्रल जेल में फांसी देने वाली रस्सी मनिला का निर्माण अंग्रेजों के समय से होता रहा है इस जेल में अंग्रेजी द्वारा ये मशीन लगाई गई थी इसी मशीन की मदद से फांसी का फंदा बनाने वालों की टीम 20 फीट मनिला रस्सी बनाती है इसी से कैदियों को फांसी दी जाती है बक्सर से पहले फांसी की रस्सी फिलीपिंस की राजधानी मनीला में बनाई जाती थी इसलिए इसका नाम मनीला रस्सी रखा गया है बक्सर जेल में सजा काट रहे कैदियों को प्रशिक्षण के तौर पर फांसी का फंदा तैयार करने का काम मिलता है

कैसे होती है फांसी की तैयारियां

कैदी की दया याचिका खारिज होने के बाद जेल प्रशासन कोर्ट से डेथ वारंट की माग करता है उस डेथ वारंट में फांसी की तारीख और समय लिखा होता है और डेथ वारंट आने के बाद जेल प्रशासन कैदी को ऐसी जैल में भेज देते हैं जहॉ फांसी की व्‍यवस्‍था हो ये सेल 24 घंटे एक गार्ड की निगरानी में होता है. दिन में दो बार इस कैदी की तलाशी ली जाती है. सुप्रीटेंडेंट, डिप्टी सुप्रीटेंडेंट या मेडिकल ऑफिसर कैदी के खान-पान की जांच करते हैं. बेहद सावधानी बरती जाती है ताकि कैदी किसी भी तरीके से आत्महत्या न कर सके कैदी के परिवार वालों को इसकी सूचना 10 से 15 दिन पहले देनी होती है ताकि वो कैदी से आकर मिल सकें जिस जेल कैदी को फांसी दी जाती उसे वाकी कैदीयों से अलग रखा जाता है

क्‍या होता है फांसी वाले दिन

फांसी वाले दिन कैदी को तकरीबन 4 बजे जगा दिया जाता है फ्रैश होने के बाद उसे नहाने को कहा जाता है और उसे नये कपडे पहनने को दिये जाता है फांसी देने से पहले कैदी से उसकी अंतिम इच्‍छा पूछी जाती है जिसमें परिवार वालों से मिलना अच्‍छा खाना खाना आदि या जो भी कैदी अपनी जिंदगी खत्‍म होने से पहले करना चाहता हो कैदी की अंतिम इच्‍छा पूरी होने के बाद जेल सुप्रीटेंडेंट कैदी को डेथ वारंट कैदी को पढकर सुनाते हैं और उस पर कैदी के साइन लेते हैं इसके बाद जेल सुप्रीटेंडेंट की निगरानी में गार्ड कैदी को फांसी कक्ष में लाते हैं लेकिन इससे पहले कैदी के हाथ बांध दिये जाते हैं और उसके मुह पर काला कपडा डाल दिया जाता है ताकि कैदी फांसी की तैयारी को ना देख सके फांसी कक्ष में लाने के बाद कैदी को एक लकडी के तख्‍त पर बने सफेद गोले के बीच में खडा कर दिया जाता है और उसके गले में फांसी का फंदा डाल दिया जाता है इसके नियत समय पर मैजूदा अधिकारीयों के इशारे पर जल्‍लाद लीवर खींंच देता है और लीवर खींचते ही कैदी जिस लकडी के तख्‍त पर खडा होता है वह दो हिस्‍सों में बट जाता है और कैदी उस तख्‍त के नीचे बने लगभग 15 फुट गहने कूऐ में लटक जाता है लीवर खींचने के लगभग आधे घंटे बाद लाश को फंदे से उतारा जाता है. लेकिन उसे तभी उतारा जाता है जब मेडिकल ऑफिसर उसकी मौत की पुष्टि कर दे. मौत की पुष्टि के बाद मजिस्ट्रेट, मेडिकल ऑफिसर और सुप्रीटेंडेंट तीनों डेथ वॉरंट पर साइन करते हैं. इसके बाद उन्हें डेथ वॉरंट कोर्ट में वापस जमा करना होता है फांसी के बाद लाश परिवार को सौंप दी जाती है जिन कैदियों के परिवार नहीं होते उनकी मौत से पहले उनसे पूछा जाता है कि अंतिम संस्कार कैसे करना है फांसी वाले दिन फांसी घर में किसी की भी कोई बातचीत नहीं होती वहां सिर्फ और सिर्फ इशारों पर ही काम होता है इसके लिए जो भी जरूरी बातचीत कार्य होते है वो फांसी से पहले ही पूरे कर लिए जाते हैं

कहॉ-कहॉ बने हैं फांसी घर

भारत की तकरीबन हर सेंट्रल जेल (केंद्रीय कारागार) में फांसी-घर बने हैं फांसी घर को सेंट्रल जेल में ही इसलिए बनाया जाता है क्योंकि जिला जेलों की तुलना में सेंट्रल-जेल के सुरक्षा इंतजाम कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं भारत की कुछ जेलों में अभी फांसी-घर इस्तेमाल में लाए जाने की स्थिति में हैं जैसे येरवदा जेल (महाराष्ट्र), दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल, मेरठ सेंट्रज जेल और कोलकता सेंट्रल जेल में अभी फांसी दी जा सकती है

फांसी की सजा सुनाने के बाद पेन की निब क्यों तोड़ दी जाती है

भारतीय कानून में फांसी सबसे बड़ी सजा है जज फांसी की सजा सुनाता है तो फैसले के बाद पेन की निब तोड़ देता है ऐसा करने के पीछे संवैधानिक वजह है एक बार फैसला लिख दिए जाने के बाद खुद जज को भी अधिकार नहीं होता है कि वो फैसले को बदल सके इसके अलावा एक कारण और भी है माना जाता है कि पेन से किसी की जिंदगी खत्म हुई है इसलिए उसका दोबारा प्रयोग न हो

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